प्रशासनिक सादगी और जनसंवाद की मिसाल: पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को मिला पद्म भूषण पुरस्कार

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देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति के पुरोधा, पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' से नवाजा गया है। इस खबर के सामने आते ही पूरी देवभूमि में खुशी और गौरव की लहर दौड़ गई है। 'भगत दा' के नाम से लोकप्रिय कोश्यारी का पूरा जीवन संघर्ष, सादगी और वैचारिक दृढ़ता की एक अनूठी मिसाल रहा है। भाजपा कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस सम्मान को उत्तराखंड की संघर्षशील माटी और जमीन से जुड़े नेतृत्व का वास्तविक सम्मान बताया है। बागेश्वर जिले के एक सुदूर और बेहद साधारण परिवार में जन्मे भगत सिंह कोश्यारी का सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। छात्र जीवन से ही उनमें गजब की नेतृत्व क्षमता थी, जिसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे अल्मोड़ा कॉलेज में छात्रसंघ के महासचिव चुने गए। इसके बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और जनसंघ व भाजपा की राजनीति में कदम रखा। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने एक शिक्षक, प्रखर लेखक और निर्भीक पत्रकार के रूप में भी समाज में अपनी गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने 'पर्वत पीयू' जैसे प्रकाशनों के माध्यम से पहाड़ की आवाज को बुलंद किया। पृथक राज्य आंदोलन के दौरान भगत सिंह कोश्यारी उन चुनिंदा चेहरों में शामिल थे, जिन्होंने पहाड़ की भौगोलिक विषमताओं, पलायन, बेरोजगारी और पिछड़ेपन को राष्ट्रीय पटल पर पुरजोर तरीके से उठाया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के अनुसार, “उत्तराखंड आंदोलन के वैचारिक आधार को मजबूत करने में भगत दा की भूमिका ऐतिहासिक रही।” वे गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करते थे। राज्य गठन के बाद उन्होंने भाजपा संगठन को पहाड़ के उन दुर्गम इलाकों तक पहुंचाया जहाँ पहुंचना नामुमकिन माना जाता था।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भगत दा का कार्यकाल भले ही बहुत लंबा नहीं रहा, लेकिन अपनी प्रशासनिक सादगी और सरल कार्यशैली के कारण वे हमेशा जनता के दिलों में रहे। वे बिना किसी तामझाम और बड़े काफिले के सीधे जनता के बीच पहुंच जाते थे। वे भाषणों से ज्यादा 'संवाद की राजनीति' पर भरोसा करते थे। महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल देश के सबसे बड़े और संवेदनशील राजनीतिक घटनाक्रमों का गवाह बना। हालांकि, विपक्ष की आलोचनाओं और बड़ी बहसों के बीच भी उन्होंने संवैधानिक गरिमा को बनाए रखा। आज भी उनकी सादगी का आलम यह है कि उन्होंने हाल ही में मृत्यु के बाद अंगदान और देहदान का संकल्प लेकर समाज को एक महान संदेश दिया है। उत्तराखंड की धरती ने हमेशा से देश को कला, साहित्य, पर्यावरण, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र में अद्वितीय रत्न दिए हैं। भगत सिंह कोश्यारी से पहले भी कई हस्तियों ने राष्ट्रीय पुरस्कार पाकर राज्य का नाम रोशन किया है। चिपको आंदोलन के जनक और महान पर्यावरणविद्, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिमालय और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। साहित्य, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध और लेखन के लिए सम्मानित। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत को देश-विदेश में पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध लोक गायिका। भारतीय महिला हॉकी टीम की स्टार खिलाड़ी, जिन्होंने खेल के मैदान पर देश और राज्य का झंडा बुलंद किया। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और समाजसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित। चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान और मानवता की सेवा के लिए सम्मानित। कृषि क्षेत्र में नए प्रयोगों और उल्लेखनीय कार्यों के माध्यम से किसानों को नई राह दिखाने वाले प्रगतिशील किसान। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भगत सिंह कोश्यारी की यह यात्रा नई पीढ़ी के लिए एक खुली किताब है, जो यह सिखाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो पहाड़ जैसी चुनौतियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं।