देहरादून। अपरिहार्य परिस्थितियों, विपरीत समय और गंभीर खतरों के बीच जिन बच्चों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अदम्य साहस और सूझबूझ का परिचय दिया, उन्हें आखिरकार उनकी इस बहादुरी का ऐतिहासिक सिला मिल गया है। राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में आयोजित एक भव्य और गरिमामयी समारोह के दौरान केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के छह प्रतिभावान बच्चों को प्रथम 'मुख्यमंत्री राज्य बाल वीरता पुरस्कार' से सम्मानित किया। इन नन्हें जांबाजों को पदक और प्रशस्ति पत्र के साथ-साथ डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से 51-51 हजार रुपये की पुरस्कार राशि उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की गई।
उम्र छोटी, लेकिन हौसले इतने बुलंद कि मौत को सामने देखकर भी कदम पीछे नहीं हटे। कहीं खूंखार भालू के हमले के बीच साथी को बचाने के लिए बच्ची उससे भिड़ गई, तो कहीं नदी के तेज बहाव में डूबती बालिका की जान बचाने के लिए दूसरी बच्ची ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। किसी ने बादल फटने के बाद मलबे और पानी के खतरे को भांपकर परिवार के 17 सदस्यों को सुरक्षित किया, तो किसी ने सड़क पर तेज रफ्तार वाहन की चपेट में आने से बुजुर्ग की जान बचा ली। उत्तराखंड के ऐसे ही छह नन्हे वीरों के अदम्य साहस और मानवीय संवेदनशीलता को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर बड़ा सम्मान मिला। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को देहरादून के परेड ग्राउंड में इन बच्चों को प्रथम मुख्यमंत्री राज्य बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया। महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग की ओर से वित्तीय वर्ष 2026-27 में पहली बार शुरू किए गए इस पुरस्कार के लिए राज्यभर से प्राप्त आवेदनों में छह बच्चों का चयन किया गया। सम्मानित बच्चों में चमोली के तीन, जबकि चंपावत, देहरादून और टिहरी गढ़वाल के एक-एक बच्चे शामिल हैं। प्रत्येक बच्चे को पदक और प्रशस्ति पत्र के साथ 51 हजार रुपये की पुरस्कार राशि सीधे उनके बैंक खाते में भेजी गई। चमोली की दिव्या, दीपिका और आरव सिंह की बहादुरी की कहानी किसी फिल्मी घटनाक्रम से कम नहीं है। 22 दिसंबर 2025 को जीआईसी यूपीएस हरिशंकर के विद्यालय परिसर में अचानक भालू घुस आया। उसने कक्षा छह के छात्र आरव सिंह पर हमला कर दिया। इस खतरनाक स्थिति में आरव ने खुद को बचाने के लिए संघर्ष किया। वहीं कक्षा आठ की छात्रा दिव्या ने असाधारण साहस दिखाते हुए भालू का पीछा किया और आरव को बचाने का प्रयास करते हुए उसे सुरक्षित विद्यालय तक पहुंचाने में मदद की। दूसरी ओर दीपिका ने घबराने के बजाय तत्काल सूझबूझ दिखाई और नौ अन्य विद्यार्थियों को कक्षा सात के कमरे में पहुंचाकर उनकी जान सुरक्षित की। तीनों बच्चों के साहस और तत्परता ने बड़ी अनहोनी को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चंपावत की माया ने 5 अगस्त 2025 को भारी बारिश के दौरान मानवता और साहस की मिसाल पेश की। नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से एक बालिका तेज धारा में बहने लगी। खतरे की परवाह किए बिना माया उसे बचाने के लिए आगे बढ़ीं और सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहीं। इस प्रयास में माया स्वयं भी घायल हो गईं, लेकिन उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं छोड़ी। देहरादून की आराध्या ने 2 जून 2026 को बादल फटने की घटना के दौरान असाधारण सूझबूझ दिखाई। अचानक भारी बारिश के साथ मलबा और पानी आने लगा। खतरे को समझते हुए आराध्या ने घर में मौजूद सभी 17 लोगों को तत्काल सतर्क किया और सुरक्षित स्थान पर पहुंचने में मदद की। इतना ही नहीं, उन्होंने तीन वर्षीय बच्ची को भी पानी के तेज बहाव से बचाया। टिहरी गढ़वाल की श्वेता ने 30 जनवरी 2025 को एक बुजुर्ग व्यक्ति की जान बचाकर मानवता की मिसाल कायम की। सड़क पर लाठी के सहारे चल रहे बुजुर्ग की ओर तेज रफ्तार वाहन आता देख श्वेता ने तुरंत उनका हाथ पकड़कर उन्हें सड़क किनारे सुरक्षित कर दिया। मुख्यमंत्री राज्य बाल वीरता पुरस्कार का उद्देश्य कठिन परिस्थितियों में असाधारण साहस, सूझबूझ और संवेदनशीलता दिखाने वाले बच्चों को पहचान और प्रोत्साहन देना है। इन छह बच्चों की कहानियां बताती हैं कि बहादुरी का संबंध उम्र या शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में सही निर्णय लेने के साहस से होता है। अमित शाह और मुख्यमंत्री धामी के हाथों सम्मानित हुए इन नन्हे वीरों ने साबित कर दिया कि उत्तराखंड की धरती पर साहस और मानवता की परंपरा नई पीढ़ी में भी जीवित है।

